कुछ दिन पहले मै अपने पापा के साथ प्रिंटिंग प्रेस में गया था मेरे पापा वहीं काम करते है मै कंपनी के गेट पर खड़ा था मैंने देखा कि अंकित भैया वहां से बाहर निकल रहे थे अंकित भैया क...
मैं चाहता हूं... हंसना खिल खिलाकर और साथ ही चाहता हूं खुलकर रोना भी मैं चाहता हूं दौड़ना तेज सभी से और साथ ही चाहता हूं चलना धीरे... बहुत धीरे मैं चाहता हूं सभी उलझने पल मे सुलझा ...
अक्सर ये वाक्या सुनने में आता है कि नाम में क्या रखा है ? मेरा एक दोस्त है श्याम चतुर्वेदी उसकी कहानी सुनकर आप अगली बार से नाम में क्या रखा है नहीं बोलेंगे जब उसका जन्म हुआ तो ए...