मैं चाहता हूं...
हंसना खिल खिलाकर
और साथ ही चाहता हूं खुलकर रोना भी
मैं चाहता हूं
दौड़ना तेज सभी से
और साथ ही चाहता हूं चलना धीरे... बहुत धीरे
मैं चाहता हूं
सभी उलझने पल मे सुलझा दू
और साथ ही चाहता हूं खुद से उन बातो में उलझे रहना
मैं चाहता हूं
वक़्त मै आगे निकल जाना
और साथ ही चाहता हूं पीछे कुछ छूटे न
मैं चाहता हूं
चाहता रहूं मैं हर वक़्त कुछ
और साथ ही चाहता हूं कुछ भी नहीं
collection of stories and poems
Comments
Post a Comment