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Mai chahta hu

मैं चाहता हूं...
हंसना खिल खिलाकर
और साथ ही चाहता हूं खुलकर रोना भी
मैं चाहता हूं
दौड़ना तेज सभी से
और साथ ही चाहता हूं चलना धीरे... बहुत धीरे
मैं चाहता हूं
सभी उलझने पल मे सुलझा दू
और साथ ही चाहता हूं खुद से उन बातो में उलझे रहना
मैं चाहता हूं
वक़्त मै आगे निकल जाना
और साथ ही चाहता हूं पीछे कुछ छूटे न
मैं चाहता हूं
चाहता रहूं मैं हर वक़्त कुछ
और साथ ही चाहता हूं कुछ भी नहीं

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ख्वाब का मारना

आओ तुम्हें एक ख्वाब को मरता हुआ दिखाऊं। वह चढ़ जाएगा अपनी ही बनाई किसी इमारत की छत पर और कूद जाएगा ठीक वहीं जहां तुम खड़े हो वह ठीक तुम्हारे सामने दम तोड़ देगा। या फिर ले आएगा कहीं से उम्मीदों का जहर और उसे खा कर इधर-उधर भागेगा इस उम्मीद में कि तुम उसे बचा लो लेकिन ऐसा नहीं होगा वह छोड़ देगा अपने शरीर को ढीला और उसका शरीर नीला पड़ जाएगा। या फिर वह अपनी उलझन को समेट कर उससे एक रस्सी बनाएगा और उसे अपनी गर्दन में डालकर झूल जाएगा थोड़ा छटपटाएगा और फिर मर जाएगा। या फिर आएगी रिश्तों की एक गाड़ी और उसे सड़क पर अकेला चलता देख उसे कुचल देगी और वह उसके बोझ तले दबकर मर जाएगा। अगर ऐसा ना हुआ तो वह गुमनामी के अंधेरे में चुपचाप बैठे बैठे नाउम्मीदी से धीरे धीरे खुद ही मर जाएगा बिना शोर किए,बिना कुछ कहे जैसा कि होता आया है हर बार बार बार