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Mai kon

कुछ दिन पहले मै अपने पापा के साथ प्रिंटिंग प्रेस में गया था मेरे पापा वहीं काम करते है मै कंपनी के गेट पर खड़ा था मैंने देखा कि अंकित भैया वहां से बाहर निकल रहे थे अंकित भैया कंपनी के मालिक है।
मैने उन्हे नमस्ते कहा
उन्होंने मुझसे भौहे उचकाकर पूछा "कौन?"
मैंने जवाब दिया "सोनू"
उन्होंने फिर पूछा "सोनू कौन "
मै खुद में बड़बड़ाया सोनू कौन असल में मै खुद से पूछ रहा था सोनू कौन ?
थोड़ा समय लेकर मैंने फिर से जवाब दिया "सुनील कुमार का बेटा" ये सुनकर भैया वहां से चल दिए
पर ये सवाल मेरे साथ ही रह गया कि मै कौन हूं आखिर कब तक हम अपने पापा के परिचय से अपना परिचय जोड़ेंगे और क्या मेरी पहचान मेरे नाम तक ही सीमित है

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ख्वाब का मारना

आओ तुम्हें एक ख्वाब को मरता हुआ दिखाऊं। वह चढ़ जाएगा अपनी ही बनाई किसी इमारत की छत पर और कूद जाएगा ठीक वहीं जहां तुम खड़े हो वह ठीक तुम्हारे सामने दम तोड़ देगा। या फिर ले आएगा कहीं से उम्मीदों का जहर और उसे खा कर इधर-उधर भागेगा इस उम्मीद में कि तुम उसे बचा लो लेकिन ऐसा नहीं होगा वह छोड़ देगा अपने शरीर को ढीला और उसका शरीर नीला पड़ जाएगा। या फिर वह अपनी उलझन को समेट कर उससे एक रस्सी बनाएगा और उसे अपनी गर्दन में डालकर झूल जाएगा थोड़ा छटपटाएगा और फिर मर जाएगा। या फिर आएगी रिश्तों की एक गाड़ी और उसे सड़क पर अकेला चलता देख उसे कुचल देगी और वह उसके बोझ तले दबकर मर जाएगा। अगर ऐसा ना हुआ तो वह गुमनामी के अंधेरे में चुपचाप बैठे बैठे नाउम्मीदी से धीरे धीरे खुद ही मर जाएगा बिना शोर किए,बिना कुछ कहे जैसा कि होता आया है हर बार बार बार