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A leftist approach

चुनाव नज़दीक आ रहे है और हर बार चुनावों के साथ कुछ सवाल आते है उन्हीं सवालों मै से एक है।
लेफ़्ट पार्टीज हमेशा कहती है कि राइट विंग पार्टीज हिन्दू मजोरिटी को ध्रुवीकरण के जरिए अपने साथ कर लेती है बात सही है पर ऐसा क्यों होता है?
ऐसा इसीलिए है क्योंकि तथाकथित लेफ़्ट पार्टीज या विचारधारा के बड़े चेहरे जहां हिन्दू रूढ़िवादियों की कड़े शब्दों से निंदा करते हैं वहीं दूसरी ओर वे अपना वोटबैंक बचाने के लिए तुष्टिकरण की राजनीति करते है।
मैं ऐसे कई लोगो से मिलता हूं जो स्वयं रूढ़िवादी है पर खुद को लिबरल बताते है क्योंकि लेफ़्ट आइडियोलॉजी के कई बड़े चेहरे इस्लाम की कमियों पर बोलने से डरते है या अपना लहजा इसके प्रति नर्म रखते है।
पर ऐसा क्यों होता है कि हम अपनी प्रतिक्रिया देने से पहले तथाकथित बड़े चेहरों की ओर देखते है हमे हमेशा गलत के खिलाफ बोलते रहना चाहिए और सही के साथ खड़े रहना चाहिए। ना की किसी सेलेब्रिटी या नेता का मुंह ताकना चाहिए क्योंकि ऐसा करने पर हम उनके ट्रोल में शामिल हो जाते है

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आओ तुम्हें एक ख्वाब को मरता हुआ दिखाऊं। वह चढ़ जाएगा अपनी ही बनाई किसी इमारत की छत पर और कूद जाएगा ठीक वहीं जहां तुम खड़े हो वह ठीक तुम्हारे सामने दम तोड़ देगा। या फिर ले आएगा कहीं से उम्मीदों का जहर और उसे खा कर इधर-उधर भागेगा इस उम्मीद में कि तुम उसे बचा लो लेकिन ऐसा नहीं होगा वह छोड़ देगा अपने शरीर को ढीला और उसका शरीर नीला पड़ जाएगा। या फिर वह अपनी उलझन को समेट कर उससे एक रस्सी बनाएगा और उसे अपनी गर्दन में डालकर झूल जाएगा थोड़ा छटपटाएगा और फिर मर जाएगा। या फिर आएगी रिश्तों की एक गाड़ी और उसे सड़क पर अकेला चलता देख उसे कुचल देगी और वह उसके बोझ तले दबकर मर जाएगा। अगर ऐसा ना हुआ तो वह गुमनामी के अंधेरे में चुपचाप बैठे बैठे नाउम्मीदी से धीरे धीरे खुद ही मर जाएगा बिना शोर किए,बिना कुछ कहे जैसा कि होता आया है हर बार बार बार