कुछ दिनों से रोजाना एक प्रेमी जोड़े के बारे में सुन रहा हूं कि उन्होंने अपने घर वालो कि मर्ज़ी के खिलाफ जाकर प्रेम विवाह कर लिया है लोग इस पर अपनी प्रतिक्रियाए देते है बात यह तक तो ठीक थी पर कुछ लोगों ने अपना फैसला सुनाना शुरू कर दिया है तो मै आप लोगो से यह पूछना चाहता हूं कि फैसला करने के लिए आपने क्या पयमना तय किया है
मै यहां ना ही किसी का बचाव कर रहा हूं और ही किसी के ख़िलाफ़ हूं मेरा मानना है कि हर किसी के प्यार करने का तरीका अलग होता है साथ ही मै यह भी मानता हूं कि संभोग की इच्छा को तो कतई प्यार नहीं कहा जा सकता और ऐसा कहकर मै वासना को कमतर नहीं बताना चाहता बल्कि यह कहना चाहता हूं कि ये दोनों दो अलग-अलग एहसास है मै ऐसे कई लोगो से मिला हूं जिन्होंने अपने माता पिता की मर्ज़ी के खिलाफ जाकर शादी कर ली और आज दोनों ही एक दूसरे का सर फोड़ रहे है (और इसका दोषी मैं तेजी से होते हुए मॉडर्नाइजेशन को मानता हूं क्योंकि इसके कारण लोगो मै काफी तेजी आई जिसके कारण उन्हें आकर्षण और प्रेम मै अंतर दिखना बंद हो गया) साथ ही यह भी सच है कि जिन लोगो की शादी उनके माता पिता के फैसले से हुई है उनके भी हालात कुछ अच्छे नहीं है।
कुछ लोग कहते है कि अभी उनमें समझदारी कि कमी है और मै भी मानता हूं कि उनमें समझदारी कि कमी है क्योंकि समझदारी से तो समझौते किए जाते है ना कि प्रेम
प्रेम कभी भी एकदम से नहीं होता इसीलिए मै लव एट फर्स्ट साइट को नकारता हूं असल मै प्रेम कई चरण मै धीमे धीमे होता है जिसका फर्स्ट स्टेज होता है आकर्षण और धीरे धीरे इसमें अन्य भाव जुड़ते जाते है
मेरा मानना है कि प्यार की अपनी कोई परिभाषा नहीं होती और न ही मै अपनी सीमित समझ से इसे किसी खांचे मै फिट करता हूं क्योंकि प्रेम तो आपको दायरे से बाहर देखने में मदद करता है
मैं चाहता हूं... हंसना खिल खिलाकर और साथ ही चाहता हूं खुलकर रोना भी मैं चाहता हूं दौड़ना तेज सभी से और साथ ही चाहता हूं चलना धीरे... बहुत धीरे मैं चाहता हूं सभी उलझने पल मे सुलझा ...
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