अक्सर अख़बारों में पढ़ने को मिलता है कि इस साल इतने लोगो ने किसानी से पलायन किया। पर अखबारो में उनके आगे की जिंदगी के बारे में कोई जिक्र नहीं किया जाता।
बात पिछले साल की है पेशे से मिस्त्री एक व्यक्ति जो कि कुछ साल पहले ही शहर आया था उसने बताया कि वह पहले किसानी करता था और फसल का मूल्य ना मिलने के कारण उसका कर्ज काफी बढ़ गया था सो उस कर्ज को खत्म करने के लिए उसने गाव के एक व्यक्ति से कर्ज लिया जो कि शहर में ठेकेदार था और इस कर्ज को चुकाने के लिए उसने ठेकेदार के यह काम करना शुरू कर दिया इस तरह वह शहर आया ठेकेदार हर महीने की तनख्वाह से कुछ रुपए अपनी किश्त की तरह काट लेता है और बचे हुए रुपयों को उसके परिवार को गांव में भेज देता है उसने बताया ये आखिरी साल है इसके बाद वो कर्ज से मुक्त हो जाएगा और इसके बाद वह अपना काम करेगा साथ ही उसने यह भी बताया कि उसका परिवार अब भी किसानी से जुड़ा हुआ है उसने बड़े गर्व से बताया कि उसका बेटा पढ़ाई के साथ किसानी भी करता है मैंने उससे पूछा शहर में उसकी जीविका कैसे चलती है? तो वह बोला "मारिहा मन सुखैय पेट तब होतो टका से भेट" ये एक लाइन उसकी पूरी ज़िन्दगी का सार थी जो कि उसके जीवन के संघर्ष को बताती है
मैं चाहता हूं... हंसना खिल खिलाकर और साथ ही चाहता हूं खुलकर रोना भी मैं चाहता हूं दौड़ना तेज सभी से और साथ ही चाहता हूं चलना धीरे... बहुत धीरे मैं चाहता हूं सभी उलझने पल मे सुलझा ...
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