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Juice

हम सभी किसी न किसी रूप में गांव से जुड़े होते है चाहे वह गांव से आने वाला हमारा अनाज हो या फिर वह नानी का घर जहां हम साल में एकआध बार चले जाते है
शहर में रहकर हम अक्सर इस जोड़ को भूल जाते है हम में से कई लोगो को ये जुड़ाव सिर्फ तब महसूस होता है जब हम समाचार में दिखाए जा रहे किसानों को शहर या संसद की तरफ मार्च करते देखते है और कई लोगो को तो ये भी फिजूल ही लगता है उन्हें लगता है उन्होंने जो अनाज इस्तेमाल किया उसका भुगतान उन्होंने पैसे देकर कर दिया है वे कहते है कि किसान कुछ राजनीतिक पार्टियों के बहकावे में आकर या पैसे लेकर सड़कों पर उतर आए हैं और कुछ लोगो को अपनी दुनिया और उनकी दुनिया काफी अलग नज़र आती है और उनका मानना है कि ये दोनों दुनिया आपस में नही मिलती सो उनका हमेशा यह डायलॉग होता है "हमें उनसे क्या मतलब?"
मैं गाजियाबाद में रहता हूं यहां से कुछ किलोमीटर दूर हापुड़ पड़ता और हापुड़ अपने गन्ने की खेती और चीनी मिलों के लिए मशहूर है बात पिछले साल की मार्च की है शाम का समय था मैं घर से निकल कर गली के मोड़ पर खड़ा ही हुआ था। मेरे सामने लगभग 25 साल उम्र का एक व्यक्ति जो कि जुगाड (जेनरेटर से चलने वाली गाड़ी जिस से गन्ने का जूस भी निकाला जा सकता है) पर बैठा हुआ था। उसने हाथो से इशारा करते हुए मुझे बुलाया और "बोला भैया गन्ने का जूस पीलो ताज़ा है बिना बर्फ के" मैंने पूछा "कितने का है?" उसने जवाब दिया "दस रुपए" मैने हां कहा और उसने मुझे एक ग्लास जूस निकाल कर दिया अगले चार दिनों तक लगातार वह ठीक उसी समय पर मुझे मिलता रहा और मुझे गन्ने का जूस पिलाता रहा।
इसी बीच उसने मुझे बताया कि वह हापुड़ से है और गन्ने की खेती करता है इस साल विदेशो से चीनी का आयात कुछ ज्यादा हुआ है और साथ ही सरकार ने चीनी पर पांच प्रतिशत सेस लगा दिया है जिस कारण चीनी मिल के मालिकों ने गन्ने की खरीद में कमी कर दी और इसीलिए वह अपने गन्नों को लेकर गांव से शहर की ओर निकल आया वैसे गाजियाबाद के साथ एक मुश्किल है अन्य शहरों के लोग इसे शहर नहीं मानते और गांव के लोगो को ये शहर लगता है
इंसान का टेस्ट बदलते रहता है सो मेरे साथ भी यही हुआ कुछ दिनों के बाद मैने जूस पीना छोड़ दिया अब उसने भी गली में आना बंद कर दिया था लगभग हफ्ते बाद रात के लगभग साढ़े ग्यारह बजे पेट मै दर्द होने के कारण घर से निकल गया मैंने फार्मर्सी से दवा ली और घर आने लगा मैंने मेन रोड से ना आकर गलियों से आना ठीक समझा तभी मेरे सामने चौराहे पर खंबे पर लगी लाइट के ठीक नीचे उसी आदमी को आखिरी बार अपनी गाड़ी पर जूट के कट्टे को ओढ़कर सोते हुए देखा

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