आज गांव में पंचायत बैठी है वैसे तो अक्सर पंचायत बैठा करती है पर आज का मामला कुछ अलग है जमीन विवाद का जो है और ऐसा वैसा नहीं। आपने कई जमीन विवादों के बारे में सुना होगा पर विवाद कुछ अलग है और हो भी क्यों ना घुसलखने का जो है मै आपको सीधा कहानी पर के चलता हूं।
बात तब शुरू होती है जब आजादी से पहले हमारे गांव में हीरानाथ के हाथो में जमींदारी थी उन्होंने गांव मै बहुत सी जगह ज़मीन इकट्ठा कर ली थी लेकिन जैसे ही अंग्रेजी हुकूमत भारत छोड़कर गई तो उनके हाथ में जमीन के नाम पर केवल तीन घर बच गए जो उन्होंने अपने तीनों बेटो के नाम कर दी थी। और तीनों घरों के लिए एक घुसलखाना भी था। जिसका बटवारा वह नहीं कर पाए या उन्होंने बाटने की जरूरत नहीं समझी। हीरा नाथ के जिंदा रहते सब कुछ ठीक चल रहा था पर बात तब बिगड़ गई जब उनकी मृत्यु के बाद घुसलखाने की साफ सफाई पर आई। उनकी तीनों बहुएं रोजाना एक दूसरे से लड़ने लगी पर बात तो तब बिगड़ गई जब बड़ी बहू ने घुसलखाने में ताला लगा दिया
जिस कारण तीनों भाईयो में खूब बहस हुई बहस से कोई फैसला नहीं हुआ सो अंत मै तीनों ने इस बात को पंचायत में ले जाने की बात कही गुस्सा बहूत था सो तीनों राज़ी हो गए पंचायत मै फैसला हुआ कि घुसलखाने को तीन बराबर भागों मै बाट दिया जाए तीनों इस बात से खुश नहीं थे तीनों ही चाहते थे कि जमीन सिर्फ मुझे ही मिले पर पंचायत की बात माननी पड़ी और वे घर चले गए पर अगले दिन फिर पंचायत लगी क्योंकि उन तीनों मै से किसी के पास इतना पैसा नहीं था कि घुसलखाने को तोड़कर फिर से बनाया जा सके होता भी कहा से तीनों भाई एक नंबर के निकम्मे थे उनके पिता के रहते उन्होंने कोई काम नहीं किया और अब जैसे तैसे घर चला रहे थे तब पंचायत ने तीनों को सरकारी स्कीम के बारे मै बताया की जिसमे सरकार लोगो को घुसलखाने बनवाने मै मदद करती है और इस तरह ये विवाद खत्म हुआ
मैं चाहता हूं... हंसना खिल खिलाकर और साथ ही चाहता हूं खुलकर रोना भी मैं चाहता हूं दौड़ना तेज सभी से और साथ ही चाहता हूं चलना धीरे... बहुत धीरे मैं चाहता हूं सभी उलझने पल मे सुलझा ...
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