बात दो साल पहले की है मै अपने पिता जी के साथ मामा के घर जा रहा था। हमारे साथ मेरा छोटा भाई चंदन भी था हम तीनो मोटरसाइकिल से जा रहे थे। मैं मोटरसाइकिल चला रहा था हम एक मस्जिद के सामने से होकर गुजरे मस्जिद के उपरी मंजिल पर मदरसा था छोटे बच्चे वहा से तालीम लेकर निकल रहे थे काफी भीड़ भाड़ थी क्योंकि नामाज का भी समय था मै बड़ा संभाल कर बाइक चला रहा था संभाल कर इसलिए क्योंकि मेरे पिता जी और मेरा भाई दोनो मेरे पीछे बैठे थे कि अचानक एक छोटा लड़का जो कि मदरसे से आ रहा था और गाड़ी के दो कदम आगे चल रहा था दौड़कर रोड पार करने लगा मैने ब्रेक मारा गाड़ी धीरे चल रही थी सो रुक गई पर बाइक के अगले पहिए से टकराकर गिर गया वह रोने लगा मेरे पिता जी बाइक से उतरकर उस बच्चे तक पहुंचे ही थे कि अचानक मुझे एक भीड़ ने घेर लिया मेरे पिताजी उन्हें समझाने के लिए आए ही थे कि आदमी ने उन्हेधक्का देकर पीछे कर दिया और इसी बीच मेरे पास खड़े एक आदमी ने मेरी गर्दन पर घूंसा जड़ दिया मेरे समझ मै कुछ नहीं आ रहा था आसपास कोई चिल्लाया "हिन्दू लड़का है मारो इसे" बस फिर क्या था उस आदमी ने एक एक करके चार मुक्के जड़ दिए तभी एक उम्रदराज आदमी ने अपनी बाहों मै समेटे हुए मुझे भीड़ दूर ले जाने लगे बाकी लोगो ने उनसे कहा भी कि "मुल्ला जी इसे छोड़ दो इसने हमारे धर्म के बच्चे को चोट पहुंचाई है" मुझे उस व्यक्ति द्वारा प्रयोग मै लाए गए शब्दों का ठीक से पता नहीं पर उसका भाव यही था
"तुमने देखा मारते" मुल्ला जी ने प्रतिउत्तर दिया "मैने देखा है वो पहिए से टकराकर गिर ह" मुल्ला जी ने कहा मुझे उन लोगो से दूर करते हुए मुल्ला जी ने उन लोगो लगातार सवाल किए जिससे उन लोगो का दिमाग सवालों मै ही उलझा रहा भीड़ से दूर आकर उन्होंने मुझे बाइक स्टार्ट करने को कहा पापा भी पीछे से गए मैंने बाइक स्टार्ट की और सीधे घर को चला आया।
घर आने के बाद चंदन ने मम्मी को पूरी बात बताई। मम्मी ने पापा से पूछा कि आप क्या कर रहे थे तो उन्होंने धर्म सूचक गाली देते हुए कहा कि मुझे कुछ लोगो ने पीछे पकड़ रखा था। वहा दूसरी ओर मै खूब तेज रो रहा था मम्मी ने मुझे चुप करते हुए कहा कि रोड़ पर तो ऐसा होता ही रहता है क्यो लड़कियों की तरह रो रहा है मैंने कहा मेरी कोई गलती नहीं थी और फिर से रोने लगा। मम्मी ने मुझे चुप करते हुए कई टिपिकल मां वाली गालियां दीं जैसे "कीड़े पड़े कमीनो में"
मैने उसके बाद लगभग एक महीने तक बाइक नहीं चलाई। इसी बीच मेरी मुलाकात कुछ ऐसे लोग से हुई जो पहले तो मुझे सहानुभूति देने के बहाने से मुझसे बात करने लगे बाद ने उन्होंने मुझे बरगलाना शुरू कर दिया जैसे उन्होंने मुझे एक जुमला सिखाया "जो खाता है गाय का गोश्त वा कभी नहीं होता हिन्दू का दोस्त" साथ ही वो मुझे ताकत का एहसास भी करा रहे थे जिससे की मै उनकी ओर प्रभावित हो सकू। पर मै ये भी नहीं भूल सकता कि मुझे भीड़ से बचने वाला व्यक्ति भी मुस्लिम था। और मै उन दोस्तों को कैसे भूल जाऊ जिनके साथ मैंने अपना बचपन बिताया है।
मेरी नज़रों में दोनो ही लोग पहला वो जिसने भीड़ का सहारा लेकर मुझे मारा और दूसरा वो जिसने मुझे बरगलाने की कोशिश की दोनो के अंदर एक ही ज़हर भरा है
आप यह सोच रहे होंगे कि मैं यह बात क्यो लिख रहा हूं। मै यह बात इसलिए नहीं लिख रहा कि मैं अपने आप को पीड़ित के रूप में दिखा सकू मै यह इसलिए लिख रहा हूं क्योंकि आजकल यह घटनाएं कुछ ज्यादा ही बढ़ गई है और लिखने से मेरा मन हल्का होता है
मैं चाहता हूं... हंसना खिल खिलाकर और साथ ही चाहता हूं खुलकर रोना भी मैं चाहता हूं दौड़ना तेज सभी से और साथ ही चाहता हूं चलना धीरे... बहुत धीरे मैं चाहता हूं सभी उलझने पल मे सुलझा ...
Excellent message!!
ReplyDeleteThank u bhai
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